गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में बीजेपी बहुमत पाने में कामयाब हुई. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका श्रेय केन्द्र सरकार के उन आर्थिक सुधारों को दिया जिसपर विपक्ष उन्हें घेरने की कोशिश कर रहा था.

पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी के मुद्दे को साधकर विपक्ष ने गुजरात में बीजेपी को हराने की उम्मीद बांधी. तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चुनाव से ठीक पहले जीएसटी को सर के बल खड़ा कर दिया और हारी हुई बाजी जीत कर पार्टी को सिकंदर बना दिया.

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात की जीत पर यह भी कहा कि देश ने उनके टैक्स सुधारों की पहल को स्वीकार करते हुए बीजेपी को हिमाचल प्रदेश में भी जीत दी है. वहीं इससे पहले उत्तर प्रदेश में पार्टी को मिली जीत को प्रधानमंत्री ने नवंबर 2016 में लिए गए नोटबंदी के फैसले को जनता का अप्रूवल बताया. प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि देश बड़े आर्थिक सुधारों के लिए पूरी तरह तैयार है और संकेत देने की कोशिश की कि आने वाले दिनों में केन्द्र सरकार कुछ अहम आर्थिक सुधारों पर फैसला ले सकती है.

अब देश आर्थिक सुधारों के लिए कितना तैयार है इसपर प्रधानमंत्री के बयान से इतर भी एक सत्य है. 1 जुलाई 2017 को संसद के अतिविशेष सत्र में मध्यरात्रि को वन नेशन वन टैक्स नीति के तहत जीएसटी की नींव रखी गई. देश के टैक्स ढांचे में इस बदलाव को इतिहास में अब तक के सबसे बड़े आर्थिक सुधार की संज्ञा दी गई.

इस आर्थिक सुधार से पूरे देश को एक एकीक्रित बाजार में बदला जाता. कारोबारी सुगमता के लिए राज्यों के बीच होने वाला व्यापार बिना किसी बाधा के किया जाता. वहीं इस सुधार में सबसे अहम पक्ष कारोबार में टैक्स चोरी को रोकने की अहम कवायद करते हुए केन्द्र सरकार की कर से आमदनी में बड़ा इजाफा करना था. लिहाजा, कई वर्षों की कवायद के बाद जीएसटी का एक ऐसा ढांचा खड़ा किया गया जो अपने उपर्युक्त मकसद को पूरा करने में सफल हो जाता.

लेकिन 1 जुलाई को जीएसटी लागू होने के बाद देशभर के सभी बड़े कारोबारियों को अपना पूरा कारोबार नए टैक्स प्रणाली के तहत रजिस्टर कराने की जरूरत थी. जीएसटी के तहत किसी भी बड़े कारोबारी को अपने पूरे कारोबार का ब्यौरा नियमित तौर पर केन्द्र सरकार को देना था. इससे केन्द्र सरकार को देश में हो रही कारोबारी गतिविधियों की 100 फीसदी जानकारी मिलती और कारोबार पर टैक्स आंकलन के काम को टैक्स चोरी से बचाया जा सकता था.

वहीं टैक्स के सही आंकलन के चलते केन्द्र सरकार की कमाई में होने वाले बड़े इजाफे से यह भी उम्मीद लगी थी कि इस टैक्स सुधार का सबसे बड़ा फायदा उपभोक्ता को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिलता. पहला, जीएसटी से देश में उपभोक्ता के लिए क्वॉलिटी उत्पाद और सेवा का ढांचा खड़ा होता जिससे सस्ती दरों पर भी उपलब्ध कराने का प्रावधान जीएसटी में मौजूद था.

लेकिन गुजरात चुनावों के प्रचार का केन्द्र नोटबंदी और जीएसटी बना. कांग्रेस ने प्रचार के शुरुआत से ही दावा किया कि नोटबंदी से किसान, मजदूर और छोटे कारोबारी परेशान हुए और इससे देश की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा. इसके साथ ही 1 जुलाई से लागू जीएसटी को राज्य में मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस ने छोटे और मध्यम कारोबारियों को रिझाने की कोशिश की. कांग्रेस की यह कोशिश एक हद तक कारगर भी दिखी जब गुजरात के कई औद्योगिक इलाकों में कारोबारी इसके विरोध में उतर आए.

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इसके जवाब में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जीएसटी में उन उत्पादों पर बड़ी रियायत का ऐलान जीएसटी काउंसिल से करा लिया जिसका सीधा ताल्लुक गुजरात के कारोबार से था. जीएसटी काउंसिल ने 7 अक्टूबर को 27 उत्पादों के टैक्स दर में कटौती का ऐलान किया. इन उत्पादों में सूरत के कपड़ा उद्योग को राहत पहुंचाने और नायलॉन और पॉलिस्टर समेत खाखरा और नमकीन जैसे खाद्य उत्पादों को राहत दी गई जिससे विरोध का सुर कमजोर पड़ जाए. वहीं जीएसटी में टैक्स चोरी रोकने के कई कड़े प्रावधान जैसे नियमित कारोबार का पूरा ब्यौरा देना टैक्स विभाग को देना को हल्का कर दिया गया जिससे कारोबारियों का विरोध खत्म हो जाए.

हालांकि इन कटौती के बावजूद कांग्रेस को उम्मीद थी कि जीएसटी लागू होने से परेशान कारोबारी बीजेपी को सबक सिखाने के लिए तैयार रहेंगे. लिहाजा, जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स भी कह दिया गया. लेकिन इस तमगे ने वित्त मंत्री को गुजरात में पार्टी की साख बचाने के लिए जीएसटी से ‘आर्थिक सुधार’ को गायब करने का दांव चलना पड़ा.