BJP victory in Tripura

त्रिपुरा में 25 साल से सत्तारूढ़ सीपीआई(एम) सरकार को विधानसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा. जहां बीते 5 चुनावों के बाद सीपीआई(एम) ने लगातार राज्य में सरकार बनाई, वहीं इस बार केन्द्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ने उसे पटखनी देते हुए अपने लिए दो-तिहाई बहुमत का रास्ता साफ कर लिया है.

चुनावों में इस नतीजे के बाद साफ है कि बीजेपी की रणनीति सत्तारूढ़ लेफ्ट से अधिक प्रभावी साबित हुई है और राज्य की जनता ने मुख्यमंत्री मानिक सरकार की लोकप्रियता को नकारते हुए बीजेपी के बदलाव के नारे को ज्यादा पसंद किया. जानें बीजेपी की वह रणनीति जिसने दिला दी ये अप्रत्याशित जीत…

42 हजार पन्ना प्रमुख
लेफ्ट पार्टी के इस गढ़ को ध्वस्त करने के लिए बीजेपी ने राज्य में प्रति 60 वोटर एक पन्ना प्रमुख तैनात करने की रणनीति बिछाई थी. गौरतलब है कि 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पन्ना प्रमुखों की रणनीति सफल होने के बाद पार्टी ने त्रिपुरा में भी कुल 42 हजार पन्ना प्रमुख नियुक्त किए. इन पन्ना प्रमुखों को उनके हिस्से में आए 60 वोटरों को साधने की जिम्मेदारी दी गई थी. पन्ना प्रमुखों को वोटरों से सीधा संपर्क साधने के साथ-साथ केन्द्र सरकार की नीतियों का प्रचार करना और वोटिंग के दिन यह सुनिश्चित करना था कि सभी वोटर अपना वोट डालने के लिए पोलिंग बूथ तक पहुंचे.

500 दिनों से त्रिपुरा में हैं 23 पदाधिकारी
पूर्वोत्तर में पार्टी ने लेफ्ट और कांग्रेस समेत अन्य क्षेत्रीय दलों का मुकाबला करने के लिए बीते दो साल के दौरान लगभग 23 पदाधिकारियों को चुनाव के कामकाज के चलते चुनावी राज्यों का दौरा करने की स्ट्रैटेजी पर काम किया. इस दौरान पार्टी के शीर्ष नेताओं और अन्य सेल के कामकाज देखने वाले पदाधिकारियों को तीनों राज्यों में केन्द्र सरकार के कामकाज और उपलब्धियों का प्रचार करने की जिम्मेदारी दी थी.

देवधर साढ़े तीन साल से हैं
त्रिपुरा में इस अप्रत्याशित जीत के लिए आरएसएस से ट्रेनिंग ले चुके बीजेपी नेता सुनील देवधर की अहम भूमिका रही. मुंबई से आने वाले देवधर ने त्रिपुरा में पार्टी के लिए बाजी पलटने का अपना काम लगभग 2 साल पहले शुरू कर दिया था. देवधर को चुनावों से पहले बीजेपी ने त्रिपुरा का इंचार्ज नियुक्त किया था.

गौरतलब है कि 2014 के आम चुनावों में देवधर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कैम्पेन मैनेजर की अहम भूमिका निभाई थी. त्रिपुरा का इंचार्ज नियुक्त होने के बाद देवधर ने राज्य में प्रचार के लिए ‘मोदी द्युत योजना’ चलाते हुए बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा मोदी सरकार की उपलब्धियों को क्षेत्रीय भाषा में पहुंचाने का काम किया.

हेमंता विश्व शर्मा तीन महीने से
राज्य में कैडर युक्त लेफ्ट पार्टी का सामना करने के लिए पन्ना प्रमुखों का सहारा लेने के साथ-साथ बीजेपी ने त्रिपुरा जीतने की जिम्मेदारी असम के वित्त मंत्री हेमंता विश्व शर्मा को सौंपी. राज्य में चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही जनवरी 2018 से हेमंता शर्मा ने त्रिपुरा में डेरा डालकर बीजेपी की जीत को तय करने का काम किया. गौरतलब है कि इससे पहले असम, अरुणाचल और मणिपुर में बीजेपी सरकार का गठन कराने में भी हेमंता शर्मा की बेहद अहम भूमिका रही है.

राम माधव का रहा नेतृत्व
त्रिपुरा समेत पूर्वोत्तर में तीनों राज्यों के चुनाव प्रचार की कमान राम माधव ने संभाली थी. बतौर पार्टी के नॉर्थ-ईस्ट इंचार्ज सभी चुनावी राज्यों के प्रभारियों के साथ राम माधव बीते कई महीनों से लगातार काम कर रहे थे. खासतौर पर त्रिपुरा में राम माधव की पहल पर राज्य की मानिक सरकार की सत्ता को विकास विरोधी करार देने की रणनीति पर काम किया गया. इसके अलावा राम माधव के नेतृत्व में ही पार्टी ने राज्य में ट्राइबल वोटरों के बीच पार्टी को पहुंचाते हुए बीजेपी की जीत को तय किया.

पिछले चार साल में दर्जनों मंत्रियों के दौरे हुए
कैडर युक्त लेफ्ट पार्टियों के मुकाबले के लिए बीजेपी ने सिर्फ संगठनात्मक तौर पर पार्टी को नहीं खड़ा किया. बीजेपी ने राज्य के चुनावों के लिए प्रधानमंत्री की दो अहम रैलियों के साथ-साथ केन्द्र सरकार के दर्जनों मंत्रियों को प्रचार में उतारने का काम किया. गौरतलब है कि बीते चार साल के कार्यकाल के दौरान बीजेपी ने राज्य में लगातार केन्द्रीय मंत्रियों को भेजने का काम किया जिससे समय आने पर वह राज्य की मानिक सरकार के मुकाबले पार्टी को मजबूत विकल्प के तौर पर पेश कर सकें. केन्द्रीय मंत्रियों के इन दौरे में केन्द्र सरकार की योजनाओं का जमकर प्रचार किया गया और राज्य की जनता के सामने साफ तौर पर दलील दी गई कि मानिक सरकार ने सिर्फ राज्य को विकास से दूर रखने का काम किया है.

गुवाहाटी हेडक्वार्टर, असम से मिला पूरा सपोर्ट
त्रिपुरा में बीजेपी की इस शानदार जीत के केन्द्र में असम रहा. बीते साल असम में सरकार बनाने के बाद से लगातार बीजेपी ने पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में अपनी पैठ बनाने के लिए गुवाहाटी को पूर्वोत्तर में अपनी राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बनाया. असम के वित्त मंत्री हेमंता विश्व शर्मा को जीत का दारोमदार सौंपने के साथ-साथ त्रिपुरा इंचार्ज सुनील देवधर को भी गुवाहाटी में कैंप करने के लिए कहा गया. हालांकि चुनावों के लिए पूर्वोत्तर के अन्य दोनों राज्य नगालैंड और मेघालय के लिए भी गुवाहाटी को केन्द्र में रखा गया.